Kumar Vishwas Kavita “लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे 

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“लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे
विजय के उद्घोष, गीता के कथन तुमको नमन है

kumar
“लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे

राखियों की प्रतीक्षा, सिन्दूरदानों की व्यथाओं
देशहित प्रतिबद्ध यौवन के सपन तुमको नमन है
बहन के विश्वास, भाई के सखा, कुल के सहारे

 

 
पिता के व्रत के फलित, माँ के नयन तुमको नमन है
है नमन उनको कि जिनको काल पाकर हुआ पावन
शिखर जिनके चरण छूकर और मानी हो गये हैं
कंचनी तन, चन्दनी मन, आह, आँसू, प्यार, सपने


राष्ट्र के हित कर चले सब कुछ हवन तुमको नमन है
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये…”


प्रणाम उन वीरों को, जिन्होंने आज के ही दिन लोकतंत्र के मंदिर की रक्षा करने के लिए गोलियों और संसदकी दीवारों के बीच अपने सीने अड़ा दिए। आवाह्न है उसी संसद के भीतर बैठे तमाम सियासतदानों का, कि वो भी मर्यादित भाषा और आचरण से लोकतंत्र की लाज रखें। लोकतंत्र में ‘लोक’ के लिए उचित ‘तंत्र’ की संरचना करें, न कि ‘व्यूह’ की।

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