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गीत ढला जब पोर-पोर ने पीड़ा को जपना समझा,Dr. Kumar Vishwas

Dr. Kumar Vishwas

 

 

 

Dr. Kumar Vishwas

Dr. Kumar Vishwas

गीत ढला जब पोर-पोर ने पीड़ा को जपना समझा,
खुद का दर्द सहज गाया तो दुनिया ने अपना समझा ,
शाल-दुशालों में लिपटा यह अक्षर जीवन कविता का,
हमने नींद बेचकर पाया दुनिया ने सपना समझा..!

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मन तुम्हारा हो गया तो हो गया Presenting Dr Kumar Vishwas in a nostalgic mood

Mann Tumhara | मन तुम्हारा | Dr Kumar Vishwas 2017

 

मन तुम्हारा हो गया तो हो गया

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एक तुम थे जो सदा से अर्चना के गीत थे

एक हम थे जो सदा ही धार के विपरीत थे

ग्राम्य-स्वर कैसे कठिन आलाप नियमित साध पाता



द्वार पर संकल्प के लखकर पराजय कंपकंपाता क्षीण सा स्वर खो गया

तो खो गया मन तुम्हारा हो गया तो हो गया

***

लाख नाचे मोर सा मन लाख तन का सीप तरसे

कौन जाने किस घड़ी व्याकुल धरा पर मेघ बरसे

Mann Tumhara | मन तुम्हारा | Dr Kumar Vishwas 2017

Mann Tumhara | मन तुम्हारा | Dr Kumar Vishwas 2017

अनसुने चाहे रहे तन के सजग शहरी बुलावे प्राण में उतरे मगर

जब सृष्टि के आदिम छलावे बीज बदल बो गया तो बो गया

मन तुम्हारा हो गया तो हो गया

मन तुम्हारा हो गया तो हो गया Presenting Dr Kumar Vishwas

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Kumar Vishwas Kavita “लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे 

kumar

“लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे
विजय के उद्घोष, गीता के कथन तुमको नमन है

kumar

“लिख चुकी है विधि तुम्हारी वीरता के पुण्य लेखे

राखियों की प्रतीक्षा, सिन्दूरदानों की व्यथाओं
देशहित प्रतिबद्ध यौवन के सपन तुमको नमन है
बहन के विश्वास, भाई के सखा, कुल के सहारे

 

 
पिता के व्रत के फलित, माँ के नयन तुमको नमन है
है नमन उनको कि जिनको काल पाकर हुआ पावन
शिखर जिनके चरण छूकर और मानी हो गये हैं
कंचनी तन, चन्दनी मन, आह, आँसू, प्यार, सपने


राष्ट्र के हित कर चले सब कुछ हवन तुमको नमन है
है नमन उनको कि जिनके सामने बौना हिमालय
जो धरा पर गिर पड़े पर आसमानी हो गये…”


प्रणाम उन वीरों को, जिन्होंने आज के ही दिन लोकतंत्र के मंदिर की रक्षा करने के लिए गोलियों और संसदकी दीवारों के बीच अपने सीने अड़ा दिए। आवाह्न है उसी संसद के भीतर बैठे तमाम सियासतदानों का, कि वो भी मर्यादित भाषा और आचरण से लोकतंत्र की लाज रखें। लोकतंत्र में ‘लोक’ के लिए उचित ‘तंत्र’ की संरचना करें, न कि ‘व्यूह’ की।

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Dr. Kumar Vishwas प्रतिध्वनियाँ ध्वनियों से बोलीं,शांत रहो कोलाहल है…!!

तम शाश्वत है,रात अमर है,गिरवीं पडे उजाले बोले,
सूरज को युगधर्म सिखाते,अँधियारों के पाले बोले !
चीरहरण पर मौन साधते,प्रखर-मुखों के ताले बोले,
बधिरों के हित रचो युग-ऋचा,वाणी के रखवाले बोले,
कहा समस्या ने निदान से,हल ना होना ही हल है !
प्रतिध्वनियाँ ध्वनियों से बोलीं,शांत रहो कोलाहल है…!!
संविधान से सत्ता बोली,हुकुम-उदूली जारी है ,
कहा न्याय ने निर्दोषों से,सच कहना बीमारी है,
खेतों से पटवारी बोला,श्रम पर स्याही भारी है ,
घुटी चीख़ से पीड़ा बोली,कंठ बहुत आभारी है ,
सर्पर्णियाँ मणियों से बोलीं,बाहर बडा हलाहल है !
प्रतिध्वनियाँ ध्वनियों से बोलीं ,शांत रहो कोलाहल है…!!
खेतों से कॉलोनी बोली,हर कब्जा अनुशासन है ,
पंतजलि से कहा योग ने ,च्यवनप्राश ही आसन है,
विदुर-नीति विदुरों से बोली ,परम सत्य इंद्रासन है ,
मतदाता से कहा भूख ने ,लोकतंत्र ही राशन है ,
संसद की लाचारी बोली ,चुप्पी चीखों का हल है !
प्रतिध्वनियाँ ध्वनियों से बोलीं ,शांत रहो कोलाहल है…!!http://hindi-shayaristatus.in
धर्मराज से तृष्णा बोली ,यक्ष-प्रश्न टाले जाएँ ,
आस्तीन ने किया निवेदन ,कुछ विषधर पाले जाएँ ,
घाट घेरते पंडे बोले ,सागर तक नाले जाएँ ,
एकलव्य से गुरुकुल बोले, कटे अँगूठें ले जाएँ,
प्रश्न वही प्रासंगिक है जो ,हल होकर भी बेहल है !
प्रतिध्वनियाँ ध्वनियों से बोलीं ,शांत रहो कोलाहल है…!!

Dr. Kumar Vishwas प्रतिध्वनियाँ ध्वनियों से बोलीं,शांत रहो कोलाहल है…!!