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दर्द कागज़ पर, मेरा बिकता रहा,Hindi Kavita

दर्द कागज़ पर,
मेरा बिकता रहा,

मैं बैचैन था,
रातभर लिखता रहा..

छू रहे थे सब,
बुलंदियाँ आसमान की,

मैं सितारों के बीच,
चाँद की तरह छिपता रहा..

अकड होती तो,
कब का टूट गया होता,

मैं था नाज़ुक डाली,
जो सबके आगे झुकता रहा..

बदले यहाँ लोगों ने,
रंग अपने-अपने ढंग से,

रंग मेरा भी निखरा पर,
मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..

जिनको जल्दी थी,
वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,

मैं समन्दर से राज,
गहराई से सीखता रहा..!!

“ज़िन्दगी कभी भी ले सकती है करवट…
तू गुमान न कर…

बुलंदियाँ छू हज़ार, मगर…
उसके लिए कोई ‘गुनाह’ न कर.

कुछ बेतुके झगड़े,
कुछ इस तरह खत्म कर दिए मैंने

जहाँ गलती नही भी थी मेरी,
फिर भी हाथ जोड़ दिए मैंने

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हर जन्म मुझे हमसफ़र बनाए रखना Hindi Shayari

हर जन्म मुझे हमसफ़र बनाए रखना

 

हर जन्म मुझे हमसफ़र बनाए रखना

हर जन्म मुझे हमसफ़र बनाए रखना

थामा है जो तुमने हाथ ये
सफर निबाहे रखना मीठी शरारतें बनाए रखना
जब भी रहू मै उदास तुम मुझे हँसाए रखना

खूबसूरत बँधन को बनाए रखना खो न जाना
दुनिया के भँवर में अपनी सांस मेरी सांस से मिलाए रखना

मिले जो किसी मोड़ पर अँधियारा तुम उसमे उजियारा बनना
मिले जो गम किसी राह पर तुम हर पल खुशियों से भरना

मुझसे ज्यादा मुझको पहचानना कहे बिन दिल की हर बात जानना
भर आये जो मेरी आँख में आँसू तुम इनकी कद्र जानना

हम दोनों की स्वतंत्र पहचान बनाए रखना
हर जन्म मुझे हमसफ़र बनाए रखना

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और कुछ देर यूं ही शोर मचाये रखिये,

और कुछ देर यूं ही शोर मचाये रखिये,
आस्मां है तो उसे सर पे उठाये रखिये..

उंगलिया गर नही उट्ठें, तो न उट्ठें लेकिन,
कम से कम उस की तरफ आंख उठाये रखिये..

बारिशें आती है तूफान गुजर जाते है,
कोहसारों की तरह पांव जमाये रखिये..

खिड़कियां रात को छोड़ा न करें आप खुलीं,
घर की है बात तो फिर घर में छिपाये रखिये..

अब तो अक्सर नजर आ जाता है दिल आंखों में,
मैं न कहता था कि पानी है दबाये रखिये..

कौन जाने कि वो कब राह इधर भूल पड़े,
अपनी उम्मीद की शमाओ को जलाये रखिये..

कब से दरवाजों की दहलीज तरसती है यारों,
कब तलक गाल को कोहनी पे टिकाये रखिये..

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झुकी सी निगाहें, हिंदी कविता

झुकी सी निगाहें

ये झुकी झुकी सी निगाहें ,
किसी गुलाब की तो नहीं ..
ये सुर्ख लाल रसीले होंठ ,
मेरे आफ़ताब की तो नहीं ..

शबनमी लबों की वो महक,
सुगंध रजनीगंधा तो नहीं ..
बिखरे जुल्फ जो चेहरे पे ,
छूआ पागल बयार तो नहीं ..

कजरारे नयनों से देखती ,
पनघट पे कामिनी तो नहीं..
क्यों ठहर जाते ये नयना ,
खोई मेरी संगिनी तो नहीं ..

शरमाती सी यों बैठी हुई,
वो मेरी लाजवंती तो नहीं ..
भटक रहा हूँ मैं जंगल में,
बिछड़ी दायमन्ती तो नहीं ..

शस्य श्यामला छटा बिखेरी ,
नेह निमंत्रण देती तो नहीं ..
कैसे कहूँ तुम सिर्फ मेरे हो ,
शर्म से कुछ कहती तो नहीं..

नदी तट कंचन सी काया ,
आमंत्रण है देती तो नहीं ..
जो भी बनाया है उसको ,
“राजू” संग है तो नहीं…