0

आप अकेला अवतरे, मरै अकेला होय। जय जिनेन्द्र

jain

आप अकेला अवतरे, मरै अकेला होय।
यो कबहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय॥

jain

jain

जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय।
घर सम्पत्ति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय॥


दिपै चाम-चादर मढ़ी, हाड़ पींजरा देह।
भीतर या सम जगत में, और नहीं घिन गेह॥