झुकी सी निगाहें, हिंदी कविता

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झुकी सी निगाहें

ये झुकी झुकी सी निगाहें ,
किसी गुलाब की तो नहीं ..
ये सुर्ख लाल रसीले होंठ ,
मेरे आफ़ताब की तो नहीं ..

शबनमी लबों की वो महक,
सुगंध रजनीगंधा तो नहीं ..
बिखरे जुल्फ जो चेहरे पे ,
छूआ पागल बयार तो नहीं ..

कजरारे नयनों से देखती ,
पनघट पे कामिनी तो नहीं..
क्यों ठहर जाते ये नयना ,
खोई मेरी संगिनी तो नहीं ..

शरमाती सी यों बैठी हुई,
वो मेरी लाजवंती तो नहीं ..
भटक रहा हूँ मैं जंगल में,
बिछड़ी दायमन्ती तो नहीं ..

शस्य श्यामला छटा बिखेरी ,
नेह निमंत्रण देती तो नहीं ..
कैसे कहूँ तुम सिर्फ मेरे हो ,
शर्म से कुछ कहती तो नहीं..

नदी तट कंचन सी काया ,
आमंत्रण है देती तो नहीं ..
जो भी बनाया है उसको ,
“राजू” संग है तो नहीं…

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