गीत ढला जब पोर-पोर ने पीड़ा को जपना समझा,Dr. Kumar Vishwas

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Dr. Kumar Vishwas
Dr. Kumar Vishwas

गीत ढला जब पोर-पोर ने पीड़ा को जपना समझा,
खुद का दर्द सहज गाया तो दुनिया ने अपना समझा ,
शाल-दुशालों में लिपटा यह अक्षर जीवन कविता का,
हमने नींद बेचकर पाया दुनिया ने सपना समझा..!

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