अल्ताफ हुसैन हाली- मां बहनों बेटियों दुनिया की जीनत तुमसे है

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“मां बहनों बेटियों दुनिया की जीनत तुमसे है-

मुल्कों की बस्ती हो तुम कम्मो की इज्जत तुमसे है : 

 

आगे बढ़े क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम

आगे बढ़े क़िस्सा-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम

सब कुछ कहा मगर खुले राज़दाँ से हम




अब भागते हैं साया-ए-इश्क़-ए-बुताँ से हम

कुछ दिल से हैं डरे हुए कुछ आसमाँ से हम

हँसते हैं उस के गिर्या-ए-बे-इख़्तियार पर

भूले हैं बात कह के कोई राज़दाँ से हम

अब शौक़ से बिगड़ के ही बातें किया करो

कुछ पा गए हैं आप के तर्ज़-ए-बयाँ से हम

जन्नत में तो नहीं अगर ये ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-इश्क़

बदलेंगे तुझ को ज़िंदगी-ए-जावेदाँ से हम


कह दो कोई साक़ी से कि हम मरते हैं प्यासे

कह दो कोई साक़ी से कि हम मरते हैं प्यासे

गर मय नहीं दे ज़हर ही का जाम बला से

जो कुछ है सो है उस के तग़ाफ़ुल की शिकायत

क़ासिद से है तकरार झगड़ा है सबा से

दल्लाला ने उम्मीद दिलाई तो है लेकिन

देते नहीं कुछ दिल को तसल्ली ये दिलासे

है वस्ल तो तक़दीर के हाथ शह-ए-ख़ूबाँ

याँ हैं तो फ़क़त तेरी मोहब्बत के हैं प्यासे




प्यासे तिरे सर-गश्ता हैं जो राह-ए-तलब में

होंटों को वो करते नहीं तर आब-ए-बक़ा से

दर गुज़रे दवा से तो भरोसे पे दुआ के

दर गुज़रें दुआ से भी दुआ है ये ख़ुदा से

इक दर्द हो बस आठ पहर दिल में कि जिस को

तख़फ़ीफ़ दवा से हो तस्कीन दुआ से

‘हाली’ दिल-ए-इंसाँ में है गुम दौलत-ए-कौनैन

शर्मिंदा हों क्यूँ ग़ैर के एहसान-ओ-अता से

जब वक़्त पड़े दीजिए दस्तक दर-ए-दिल पर

झुकिए फ़ुक़रा से झमकिये उमरा से

अल्ताफ़ हुसैन हाली

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